Wednesday, 18 August 2021

अफ़ग़ानिस्तान से भारतीयों को निकालने में क्या मोदी सरकार से हुई चूक?- प्रेस रिव्यू

 भारत ने जब सोमवार को अफ़ग़ानिस्तान से अपने नागरिकों को निकालना शुरू किया तो भारतीयों के काफ़िले को चार किलोमीटर की दूरी पर मौजूद सैन्य ठिकाने पर पहुंचने में पांच घंटे लग गए.


पर पहुंचने में पांच घंटे लग गए.

अंग्रेज़ी अख़बार 'द टेलिग्राफ़' की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीयों को निकाल तो लिया गया, लेकिन डर और चिंता में बीते वो घंटे भारत की अफ़ग़ानिस्तान में अचानक और तेजी से कमज़ोर होती स्थिति के संकेत थे.

अफ़ग़ानिस्तान में एक लंबे समय से मौजूदगी और निवेश के बावजूद भारत के लिए अचानक हड़बड़ी और घबराहट की स्थिति बन गई.

अख़बार के मुताबिक अमेरिकी सुरक्षा बलों की मदद से किसी तरह भारतीय दूतावास के स्टाफ़ को बाहर निकाला गया.

ये साफ़ है कि अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के तेज़ी से हुए कब्ज़े ने दुनिया भर की सरकारों को हैरान कर दिया है.

वीडियो कैप्शन,

तालिबान शासन कैसा होता है, इस महिला से सुनिए

एक राजनयिक ने 'द टेलिग्राफ़' से कहा, "भारत के पड़ोस में अचानक हुए इस बदलाव से होने वाले मध्यम और दीर्घकालिक प्रभावों का विश्लेषण करना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन फ़िलहाल इसे भूल जाइए.''

"हमने अपने राजनयिकों, अधिकारियों और नागरिकों को पहले ही अफ़ग़ानिस्तान से बाहर क्यों नहीं निकाला? हर कोई जानता था कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जा रहा है और तालिबान वापस आ रहा है, हम क्या सोच रहे थे? हमने वो क्यों नहीं किया जो हमें करना चाहिए था. हमें तालिबान के ट्रैफ़िक कंट्रोलर्स की दया पर ऐसे आख़िरी समय में निकलने की ज़रूरत क्यों पड़ी? और जो भारतीय अब भी अफ़ग़ानिस्तान में फंसे हुए हैं उनके लिए हम क्या करने जा रहे हैं?"

उन्होंने अख़बार से कहा कि पिछले कुछ दिनों में विदेश नीति की इतनी ख़राब स्थिति चिंता पैदा करने वाली है.

राजनयिक ने कहा, "हमें अपने पड़ोस में अचानक ही एक गंभीर रणनीतिक झटका मिला है और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमने जो होने वाला है उससे अपनी आंखें मूंद ली थीं. हमने अमेरिका को स्थिति का ग़लत आकलन करने दिया और हमें जो अपने राष्ट्रीय हित में क्या करना चाहिए था उसे नज़रअंदाज़ किया. अमेरिकी जा रहे थे, हम पीछे छूट रहे थे."

अफ़ग़ानिस्तान में पूर्व राजदूत विवेक काटजू इस पर और खुलकर बोलते हैं. उन्होंने कहा, "मैं पिछले कई सालों से बोल रहा हूं कि हमें तालिबान के साथ बात करनी चाहिए. इसकी ज़रूरत और तब बढ़ गई जब सभी को ये अंदाज़ा हो गया कि तालिबान का कब्ज़ा होने वाला है. अमेरिकी उनसे बात कर रहे थे तो हम क्यों नहीं? दूसरों ने भी ये सलाह दी थी, लेकिन मौजूदा विदेशी नीति निर्माताओं ने इस पर ध्यान नहीं दिया."

दिल्ली पुलिस ने उन तीन पुलिसकर्मियों की पहचान की है जिन्होंने पिछले साल उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान कथित तौर पर पांच घायलों से जबरन राष्ट्रगान गाने के लिए कहा था. ये ख़बर अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' में दी गई है.

इस घटना का वीडियो सामने आया था. इसमें दिख रहे घायलों में से एक की बाद में मौत भी हो गई थी. अख़बार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि इन पुलिसकर्मियों का लाई डिटेक्टर टेस्ट भी कराया गया था.

इस संबंध में क्राइम ब्रांच के विशेष जांच दल ने 100 से अधिक पुलिसकर्मियों से पूछताछ की और ड्यूटी चार्ट समेत कई दस्तावेज़ खंगाले. क़रीब 17 महीनों की जांच के बाद जांच दल इन तीन पुलिसकर्मियों तक पहुंच पाया.


अफ़ग़ानिस्तान की आपातकालीन आरक्षित निधि के इस्तेमाल पर आईएमएफ़ की रोक

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 46 करोड़ डॉलर की आपातकालीन आरक्षित निधि तक अफ़ग़ानिस्तान की पहुंच पर रोक लगा दी है.

अंग्रेज़ी अख़बार 'हिंदुस्तान टाइम्स' की ख़बर के मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के नियंत्रण के बाद देश के अनिश्चित भविष्य को देखते हुए ये क़दम उठाया गया है.

इस फ़ैसले के पीछे बाइडन प्रशासन का दबाव भी बताया जा रहा है. मंगलवार को बाइडन प्रशासन ने अकाउंट फ्रीज़ करके 9.5 अरब डॉलर के अफ़ग़ान रिजर्व पर भी रोक लगा दी थी.

बिहार:पानी के कनेक्शन में केंद्र और राज्य के डेटा में टकराव

अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' लिखता है कि बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने केंद्र के उन आंकड़ों पर सवाल उठाया है जिसमें 'जल जीवन मिशन' के तहत एक करोड़ 46 लाख पानी के कनेक्शन देने का दावा किया गया है.

संजयु कुमार झा ने कहा कि केंद्रीय योजना के तहत बिहार में केवल आठ लाख 44 हज़ार पानी के कनेक्शन दिए गए हैं. बाकी के कनेक्शन राज्य की 'हर घर नल का जल' योजना के तहत दिए गए हैं.

अख़बार के अनुसार ऐसा पहली बार है जब किसी राज्य ने, वो भी बीजेपी के गठबंधन वाले राज्य ने जल जीवन मिशन के आंकड़ों पर सवाल उठाया है.

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