समाजसेवी अन्ना हज़ारे एक बार फिर रामलीला मैदान में अनशन कर
रहे हैं. पिछली बार जब यहां उन्होंने अनशन किया था तो केंद्र की तत्कालीन
यूपीए सरकार को काफ़ी ज़्यादा दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा था. सात साल
पहले उस आंदोलन की सुर्ख़ियों में उन्हें देश का ‘दूसरा महात्मा गांधी’ तक
बता दिया गया था. लेकिन इस बार हालात बदले-बदले से हैं. उस समय न्यूज़
चैनलों के लिए सुपरहिट रहे अन्ना के अनशन को इस बार कम फ़ुटेज मिल रही है.

उधर,
सोशल मीडिया पर भी अन्ना हजारे का काफ़ी ज़्यादा विरोध देखने को मिल रहा
है. कई लोगों का कहना है कि अन्ना अब कांग्रेस के एजेंट बन कर आए हैं जिनका
मक़सद है 2019 के आम चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि
बिगाड़ना. वहीं, कई लोग उनका यह कह कर मज़ाक़ उड़ा रहे हैं कि अन्ना हज़ारे
ने देश को अरविंद केजरीवाल के अलावा कुछ नहीं दिया. अन्ना को लेकर एक ख़ास
वर्ग द्वारा कैंपेन चलाया जा रहा है और आरोप लगाया जा रहा है कि अन्ना ने
मोदी-मुक्त भारत का आह्वान किया है और इसके लिए वे शहीद होने के लिए तैयार
हैं जबकि वे ख़ुद फ़ौज की नौकरी छोड़ कर भाग गए थे.

अब अन्ना के फ़ौज से भागने के दावे पर आते हैं.
यहां कांग्रेस नेता मनीष तिवारी का ज़िक्र किया जाना ज़रूरी है क्योंकि यह
पहली बार नहीं है जब सरकार समर्थक किसी वर्ग या दल के नेता ने अन्ना हज़ारे
पर सेना से भागने का आरोप लगाया हो. यूपीए सरकार के समय भी यही आरोप लगाया
गया था. अब केंद्र में मोदी सरकार है तो भाजपा समर्थक अन्ना हज़ारे पर यह
आरोप लगा रहे हैं. हालांकि यह दावा 2011 में ही झूठा साबित हो गया था.
की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अप्रैल 2011 में आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र
अग्रवाल ने दक्षिणी सेना सेवा कोर (एएससी) में एक आवेदन दिया था. आवेदन
में उन्होंने अन्ना हज़ारे द्वारा सेना में दी उनके सेवाओं को लेकर कुछ
सवाल किए थे. अगस्त 2011 में एएससी की तरफ़ से तत्कालीन मुख्य सूचना
अधिकारी लेफ़्टिनेंट कर्नल अरुण कुमार ने जवाब दिए. एएससी ने बताया कि
अन्ना हज़ारे कभी भी सेना छोड़ कर नहीं गए थे. उन्होंने अपने कार्यकाल के
12 वर्ष पूरे किए और सम्मान के साथ सेना से रिटायर हुए. आरटीआई के जवाब में
यह भी बताया गया था कि सेना में रहते हुए अन्ना को सैन्य सेवा पदक,
संग्राम पदक, 25वीं स्वतंत्र जयंती पदक और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के
दौरान पश्चिमी सीमा पर सेवा देने के लिए पश्चिमी पदक से सम्मानित किया गया
था. इसके अलावा अन्ना को उनकी नौ वर्ष की लंबी सेवा के लिए भी पदक दिया
गया था.
एएससी के मुताबिक़ 14 अप्रैल, 1963 को अन्ना की सेना में
भर्ती हुई थी. महाराष्ट्र के औरंगाबाद में उनकी ट्रेनिंग हुई और बतौर
रंगरूट वे सेना में शामिल हुए. बाद में 16 नवंबर, 1963 को उन्हें सैनिक
बनाया गया. बाद में सिपाही के पद पर रहते हुए वे रिटायर हुए. आवेदन के जवाब
में यह भी बताया गया था कि अन्ना के सर्विस रिकॉर्ड में कहीं इस बात का
ज़िक्र नहीं है कि उन्हें कभी सेना द्वारा सज़ा दी गई थी. ये सभी तथ्य सोशल
मीडिया पर अन्ना हज़ारे के ख़िलाफ़ चलाए जा कुप्रचार को ग़लत साबित करते
हैं.
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