Friday, 13 April 2018

राम ने नहीं लक्ष्मण ने किया था रावण का वध फिर दोबारा जन्में थे ये महायोद्धा

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      1-   मान्यताएं और परंपराएं

भारत का पौराणिक इतिहास बेहद प्राचीन और विस्तृत है। विभिन्नताओं में एकता प्रधान इस देश की सबसे बड़ी खासियत या खामी इसी बात से समझी जा सकती है कि हर चंद कदमों पर मान्यताएं और परंपराएं पूरी तरह बदल जाती हैं। इस बदलाव से हिन्दू देवी-देवता और उनके जीवन से जुड़ी कहानियां भी बच नहीं पाई हैं।
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विष्णु के अवतार

विष्णु के अवतार राम और उनके द्वारा रावण के अंत से जुड़ी वाल्मीकि रामायण से ठीक उलट राजस्थान की लोक कथाओं में रावण की मृत्यु से जुड़ी एक अलग कथा लोकप्रिय है।
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रावण का अंत

राजस्थानी लोक कथाओं के अनुसार रावण का अंत भगवान राम के हाथों नहीं बल्कि उनके भाई लक्ष्मण की वजह से हुआ था।
वाल्मीकि रामायण
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वाल्मीकि रामायण

वाल्मीकि रामायण में यह उल्लिखित था कि रावण की जान उसकी नाभि में रखे गए अमृत के कलश में थी लेकिन राजस्थानी कथाओं में रावण की जान सूर्य के रथ के एक घोड़े की नासिका में छिपी थी, जिसे लक्ष्मण ने मुक्त कर रावण का अंत किया था।
लक्ष्मण की पत्नी
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लक्ष्मण की पत्नी

लोककथा में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला का कहीं उल्लेख नहीं है और इसमें लक्ष्मण को एक ब्रह्मचारी व्यक्ति के तौर पर दर्शाया गया है

रावण को वरदान
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रावण को वरदान

रावण को यह वरदान था कि केवल ब्रह्मचारी व्यक्ति ही घोड़े की नासिका में कैद उसकी जान को पहचान सकता है। इसलिए लक्ष्मण ने अपने बाण से रावण की छिपी जान को पहचाना और उसका विनाश किया।
राजस्थान का जैन समुदाय
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राजस्थान का जैन समुदाय

राजस्थान का जैन समुदाय इस कथा पर विश्वास करता है और यह मानता है कि राम नहीं बल्कि लक्ष्मण ने रावण का वध किया था। इसलिए वे राम को अहिंसक व्यक्ति के तौर पर पूजते हैं।
भोपो
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भोपो

राजस्थान के नायक समुदाय से जुड़े गवैये, जिन्हें भोपो कहा जाता है, का मानना है कि रावण का अंत लक्ष्मण ने किया था, इसलिए पूर्व जन्म में रावण के हाथों लक्ष्मण का वध हुआ था। यही नहीं सूर्पणखा, लक्ष्मण से विवाह करना चाहती थी लेकिन लक्ष्मण ने उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया इसलिए अगले जन्म में लक्ष्मण को सूर्पणखा से विवाह करना पड़ा।
पूर्णजन्म
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पूर्णजन्म

इसी कहानी के आधार पर पबूजी नाम के चरित्र का गठन हुआ जिनकी कहानी राम, सीता और लक्ष्मण के पूर्वजन्म से जुड़ी है।
लौकिक ताकतें
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लौकिक ताकतें

यह कहानी आज से करीब 600 वर्ष पहले लोककथाओं में पबूजी के चरित्र को स्थान दिया गया था जिनके पास लौकिक ताकतें थीं।
रावणहत्था
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रावणहत्था

राजस्थान का भोपो समुदाय निम्न वर्ग से संबंधित है। सदियों से जिनका परिवार सारंगी, जिसे रावणहत्था कहा जाता है, की धुन पर रावण के अंत से जुड़ी घटनाओं को गाता है।
रावण का पूर्वजन्म
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रावण का पूर्वजन्म

इन कथाओं के अनुसार रावण अपने पूर्वजन्म में जिन्धर्व खिंची, सूर्पणखा, राजकुमारी फूलवती और लक्ष्मण, पबूजी के रूप में जन्में थे।
खूबसूरत कन्या से प्रेम
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खूबसूरत कन्या से प्रेम

पबूजी के पिता दढल राठौड़ की एक पत्नी थी जिससे उन्हें दो संतानें, पुत्र बुरो और पुत्री प्रेमा प्राप्त हुई थी। दढल को एक बेहद खूबसूरत कन्या से प्रेम हो गया, जिससे वह विवाह करना चाहते थे। वह कन्या भी उनसे विवाह करने के लिए राजी हो गई लेकिन उसकी एक शर्त थी।
क्या थी वह शर्त?
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क्या थी वह शर्त?

शर्त के अनुसार दढल कभी रात के समय उस पर नजर नहीं रखेगा और कभी उससे यह प्रश्न नहीं पूछेगा कि वह कहां गई थी। अगर उसने ऐसी किया तो वह उसी दिन सब कुछ छोड़कर चली जाएगी।
तोड़ दिया वचन
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तोड़ दिया वचन

दढल और उस कन्या का विवाह हुआ और दोनों को पबूजी और सोना नाम की दो संतान प्राप्त हुईं। एक दिन दढल ने अपना वचन तोड़ दिया और जब अपनी पत्नी का पीछा करते-करते वह जंगल में पहुंचा तो उसने देखा कि वह एक शेरनी के रूप में अपने बेटे को दूध पिला रही थी।
कलमी
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कलमी

दढल ने शर्त का उल्लंघन किया जिसके परिणामस्वरूप वह कन्या उसे छोड़कर चली गई और जाते-जाते वह अपने पुत्र से दोबारा एक चमत्कारी घोड़ी, कलमी के रूप में मिलने का वायदा किया।
दढल की मौत
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दढल की मौत

कुछ समय बाद दढल की मौत हो गई और सारा राजपाट उनके बड़े बेटे बुरो के हाथ में आ गया और उसने पबूजी को महल से बेदखल कर दिया।
देवी देवल
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देवी देवल

लेकिन पबूजी को देवी देवल ने एक चमत्कारी घोड़ी दी जो उन्हीं की मां का पूर्वजन्म था। देवल ने उन्हें इस शर्त पर गाय दी कि वह आगे कभी भी अपनी गाय को सुरक्षित नहीं कर पाएंगे।
चमत्कारी घोड़ी
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चमत्कारी घोड़ी

चमत्कारी घोड़ी पबूजी को मिलने की वजह से बुरो और पबूजी के बीच संबंध खराब हो गए। एक बार बुरो की संपत्ति पर अतिक्रमण करने की वजह से हुए युद्ध में पबूजी ने जिन्धर्व खिंची के पिता का वध किया था। जिसके बाद शांति स्थापित करने के लिए बुरो ने अपनी बहन प्रेमा का विवाह जिन्धर्व खिंची से कर दिया।
दिखावटी संधि
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दिखावटी संधि

लेकिन यह संधि मात्र दिखावटी थी क्योंकि जिन्धर्व की नजर हमेशा बुरो की संपत्ति और पबूजी की प्रिय गाय पर थी, जिनकी रक्षा पबूजी करते थे।
पबूजी तक विवाह प्रस्ताव
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पबूजी तक विवाह प्रस्ताव

पबूजी की महानता और साहस के किस्से सिंध की राजकुमारी फूलवती तक पहुंचे और उसने अपने पिता से पबूजी तक विवाह प्रस्ताव पहुंचाने की बात कही। उसके पिता ने पबूजी तक अपने पुत्री का विवाह प्रस्ताव पहुंचाया भी लेकिन पबूजी ने उसे यह कहकर ठुकरा दिया कि वे आजीवन ब्रह्मचारी रहना चाहते हैं।
गाय की रक्षा
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गाय की रक्षा

काफी मनाने के बाद पबूजी, फूलवती से विवाह करने के लिए राजी हो गए और सिंध जाने के लिए तैयार हुए। पबूजी के सिंध जाने की बात पर देवी देवल क्रोध में आ गई कि उनके पीछे उनकी गाय की रक्षा कौन करेगा। ऐसे में पबूजी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि अगर उनकी गाय पर कोई संकट आया तो वह रास्ते में से भी वापस आ जाएंगे। फिर वही हुआ जिसका अंदेशा था।
पुरुष की पत्नी
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पुरुष की पत्नी

हिन्दू धर्म में सात फेरे होते हैं जिनमें से तीन फेरे लेने के बाद स्त्री, संबंधित पुरुष की पत्नी बन जाती है और अगले चार फेरे लेने पर संबंधित पुरुष, स्त्री का पति बनता है।
तीन फेरे
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तीन फेरे

तीन फेरे पूरे होते ही फूलवती तो पबूजी की पत्नी बन गई लेकिन जैसे ही चौथा फेरा शुरू हुआ देवी देवल प्रकट हुई और चिल्लाने लगी कि ‘जिन्धर्व खिंची मेरी गाय को चुराकर ले गया है, अब तुम अपना वायदा पूरा करो’।
सीता का पूर्वजन्म
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सीता का पूर्वजन्म

फूलवती और पबूजी चौथा फेरा नहीं ले पाए। जिसकी वजह से केवल फूलवती ही पत्नी बनी जबकि पबूजी उनके पति नहीं बन पाए। बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि देवल दरसल सीता का पूर्वजन्म था। जाते समय उन्होंने फूलवती को एक तोता दिया और कहा ‘अगर यह तोता मर गया तो मान लेना मेरा भी अंत हो गया’।
जिन्धर्व और पबूजी का युद्ध
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जिन्धर्व और पबूजी का युद्ध

जिन्धर्व और पबूजी का युद्ध हुआ, जिसमें जिन्धर्व की हार हुई। लेकिन पबूजी की सौतेली बहन का विवाह जिन्धर्व से हुआ था इसलिए उन्होंने जिन्धर्व को जीवनदान दे दिया क्योंकि वे अपनी बहन को विधवा नहीं करना चाहते थे।⇏⇏⇏
जिन्धर्व का वध
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जिन्धर्व का वध

लेकिन एक बार फिर जिन्धर्व ने धोखे से पबूजी को मारने का प्रयास किया और जैसे ही उसने अपनी तलवार निकाली एक चमत्कार हुआ जिसके बाद पबूजी अपनी घोड़ी को लेकर राम के पास स्वर्ग चले गए। आगे चलकर रूपनाथ, बुरो के पुत्र, ने जिन्धर्व का वध किया।

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